भाजपा की निगाहें नीतीश के बाद मुलायम और शरद पवार पर टिकी

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नीतीश के बाद मुलायम और शरद पवार पर टिकी भाजपा की निगाहें. क्योंकि ये वर्ष 2019 में राजग विरोधी नींव को मजबूत करने की दिशा में नए सिरे से पहल कर सकते हैं। भाजपा अब एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार और सपा के पूर्व अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव को साध कर विपक्षी एकजुटता की बची-खुची संभावनाओं को भी ध्वस्त कर देना चाहती है।

पार्टी के एक वरिष्ठ मंत्री के मुताबिक विपक्षी एकता की नींव मजबूत करने में नीतीश सबसे उपयोगी साबित हो सकते थे। ऐसे में नीतीश और जदयू को राजग के साथ लाना भाजपा के लिए बड़ी उपलब्धि है। कांग्रेस की उदासीनता के कारण शरद पवार अब इस दिशा में आगे नहीं बढ़ रहे हैं जबकि बसपा प्रमुख मायावती और टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी के बारे में पूर्वानुमान लगाना बेहद मुश्किल है। सपा में जारी खटपट से मुलायम सिंह दोराहे पर हैं। इसके अलावा नवीन पटनायक सहित कई अन्य विपक्षी नेताओं की राजनीति की धुरी कांग्रेस विरोधी रही है।

दरअसल, कांग्रेस मुक्त भारत के नारे के सहारे केंद्र की सत्ता में काबिज होने के तीन साल बाद भाजपा ने कांग्रेस को कई राज्यों की सत्ता से बाहर किया है। जिन दो महत्वपूर्ण राज्यों कर्नाटक और हिमाचल में इसी साल चुनाव होने हैं, वहां पार्टी अंतर्कलह में डूबी है। चुनाव से ठीक पहले शंकर सिंह वाघेला ने इस्तीफा देकर गुजरात में कांग्रेस को बड़ा झटका दिया है। कांग्रेस की कोशिश गैर-राजग विपक्षी दलों के क्षत्रपों के सहारे वापसी करने की थी। भाजपा अब कांग्रेस की इसी रणनीति को विफल करने में जुट गई है।

भाजपा की रणनीति दलित और पिछड़ी जातियों में गहरी पैठ बनाने की है। इसके लिए जहां पार्टी जहां कहीं कमजोर है, वहां सहयोगी दलों का सहारा ले रही है। पार्टी उत्तर प्रदेश में गैर-यादव पिछड़ी जातियों को सफलतापूर्वक साध चुकी है जबकि जदयू का साथ मिलने से अब यही स्थिति बिहार में बनने की उम्मीद कर रही है। दलित बिरादरी के व्यक्ति को राष्ट्रपति बनाने और पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देकर पार्टी बनिया-ब्राह्मणों की पार्टी वाली छवि से उबरने की कोशिश कर रही है।

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