Corona Infection: पुरखों की विरासत ने कोरोना से बचाया, नीबू और नीम बने हकीम

Corona Infection: करीब 25 फीसद आबादी प्रवासी होने और निरंतर आवागमन के बाद भी इस गांव में कोई संक्रमित नहीं हुआ। यहां चार सौ से अधिक लोग शहरों में काम करते हैं।

Corona Infection: पुरखों की विरासत ने कोरोना से बचाया, नीबू और नीम बने हकीम

Corona Infection: उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले के का पथरदेईया गांव में कोरोना का एक भी मरीज नहीं है और जबकि इस गांव की आबादी 18 सौ से ज्यादा है। क्योंकि गांव के लोगों ने पुरखों से मिली परंपरा को श्रद्धा का संरक्षण को बचा कर रखा है और ये कोरोना संक्रमण से नई पीढ़ी के  कवच बन रही है। सिद्धार्थनगर के बढ़नी का पथरदेईया गांव इसका जीता-जागता उदाहरण है, जहां कोरोना वायरस का संक्रमण फटक भी नहीं पाया। कारण, गांव में पुरखों के लगाए नीम और नींबू (lemon and neem) के पेड़ कोरोना के खिलाफ हकीम बने हुए हैं।

करीब 1800 की आबादी और 70 घर वाले इस गांव के तकरीबन हर घर में नीम और नींबू (lemon and neem) का पेड़ है। नीम की नर्म पत्तियां और नींबू उनके दैनिक खानपान में शामिल है। खानपान और वातावरण का असर ही है कि करीब 25 फीसद आबादी प्रवासी होने और निरंतर आवागमन के बाद भी इस गांव में कोई संक्रमित नहीं हुआ। यहां चार सौ से अधिक लोग शहरों में काम करते हैं। कोरोना संक्रमण की पहली लहर में सभी गांव लौटे। दो सप्ताह तक क्वांरटाइन रहे। खानपान में नींबू और नीम को शामिल करते रहे। दो बार जांच हुई और दोनों बार सभी की रिपोर्ट निगेटिव आई।

दूसरी लहर में भी करीब तीन सौ प्रवासी गांव लौटे। पहले तो सेल्फ क्वारंटाइन रहे, फिर खानपान का ध्यान रखा। नतीजा, कोई भी संक्रमित नहीं हुआ। निवर्तमान जिला पंचायत सदस्य निरंकार सिंह बताते हैं कि गांव में नीम व नींबू (lemon and neem) का पेड़ लगाने की शुरूआत करीब 80 साल पहले उनके बाबा ठाकुर मनबहाल सिंह ने की थी। वह इटवा से आकर यहां बसे थे। इस परंपरा को उनके बड़े पुत्र दुखहरण सिंह ने आगे बढ़ाया और धीरे-धीरे गांव को नीम और नींबू (lemon and neem) की अहमियत समझ में आने लगी। कुछ घर, जहां पड़े लगाने की जगह नहीं है, उन्हें छोड़कर हर घर में नीम (lemon and neem) का पेड़ है। 50-55 घरों में नींबू का पेड़ है।

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जिनके यहां नीम या नींबू का (lemon and neem) पेड़ नहीं है, वह दूसरे के यहां से बेहिचक ले सकते हैं। वहीं निरंकार सिंह के घर पर नीम की नर्सरी भी है। यह प्रति वर्ष पौधे तैयार कर मुफ्त में बांटा जाता है। आसपास के ग्रामीण भी पौधे ले जाते हैं। गांव के चारो तरफ आम, कदंब और नीम के पेड़ लगे हैं, जो वातावरण को आक्सीजन देते हैं, शुद्ध रखते हैं।