Devshayani Ekadashi-2021: जानिए आखिर क्यों चुर्तमास में श्रीहरि लेते हैं योग निंद्रा आश्रय

Devshayani Ekadashi-2021: आज देवशयनी एकादशी (Devshayani Ekadashi) है। चातुर्मास आज से शुरू हो रहा है। चातुर्मास को वर्षा ऋतु का महीना भी कहा जाता है।

Devshayani Ekadashi-2021: जानिए आखिर क्यों चुर्तमास में श्रीहरि लेते हैं योग निंद्रा आश्रय

Devshayani Ekadashi-2021: आज देवशयनी एकादशी (Devshayani Ekadashi) है। चातुर्मास आज से शुरू हो रहा है। चातुर्मास को वर्षा ऋतु का महीना भी कहा जाता है। हिंदू धर्म में इसे तपस्या का मौसम भी कहा जाता है। मान्यता है कि भगवान विष्णु चातुर्मास से गहरी नींद में चले जाते हैं और देवोत्थानी एकादशी (Devotthani Ekadashi) के दिन चार माह बाद जाग जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार जब तक भगवान विष्णु सोते हैं तब तक कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता है। आइए जानते हैं कि चातुर्मास में भगवान विष्णु के शयन का क्या रहस्य है।

बाढ़ और प्राकृतिक आपदा

कहा जाता है कि भगवान विष्णु चातुर्मास में 4 माह तक सोते हैं। इस दौरान पूरी दुनिया बाढ़ के पानी में डूब जाती है। यह वार्षिक तबाही का समय है जब दुनिया खुद को नए सिरे से तैयार करती है । यह तबाही साल की दूसरी छमाही तक चलती है यानी जुलाई से दिसंबर तक, जब सूर्य दक्षिण की ओर बढ़ता है। इस समय सूर्य कर्क राशि में प्रवेश करता है। कहा जाता है कि यह कर्क सूरज की रोशनी खाता है, इसलिए इस अवधि में दिन कम होने लगते हैं।

अंधकार का बढ़ता दायरा

पुराणों के अनुसार (according to the Puranas) इस समय के दौरान संसार में अंधकार और उदासी रहती है। भगवान विष्णु इस उथल-पुथल को संभालते-संभाल थक जाते हैं और आराम के लिए चार माह की गहरी नींद में चले जाते हैं। इस काल में भगवान विष्णु अपने विभिन्न अवतारों को अपना कार्यभार सौंपकर विश्राम करने जाते हैं।

पृथ्वी को उपजाऊ बनाने का समय

 मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष के 11वें दिन से कार्तिक के शुक्ल पक्ष के 11वें दिन तक सोते हैं। इस अवधि के दौरान पृथ्वी की उर्वरक क्षमता कम हो जाती है। जब तक भगवान विष्णु निद्रा में रहते हैं, तब तक उनके अवतार सागर में संजीवनी बूटी बनाते हैं। इसके साथ दुनिया फिर से उपजाऊ हो जाती है और उसमें एक नया जीवन भर जाता है।

 यात्रा में सावधानी

इस अवधि के दौरान यात्रा से बचने की सलाह दी जाती है। पुराणों के अनुसार प्राचीन काल में लगातार यात्रा करने वाले ऋषि मुनि भी इन चार महीनों में न कही जाते थे न कहीं आते थे। यह भी फसल का समय है, जब दुनिया फिर से हरे रंग में रंगी हुई दिखाई देना शुरू होती है।

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प्रार्थना और त्योहार के समय

इस समय लोग विभिन्न त्योहार मनाते हैं और भगवान से प्रार्थना (pray to god) करते हैं कि बारिश सही मात्रा में होनी चाहिए, न तो कम और न ही ज्यादा। आषाढ़ के इस मौसम के बाद सावन शुरू हो जाता है जिसमें लोग व्रत रखते हैं और पूरी भक्ति के साथ भगवान शिव की पूजा करते हैं।