Mamata Trap in BJP's Chakravyuh: बीजेपी के 'चक्रव्यूह' में फंसी दीदी, नंदीग्राम से तय होगी बंगाल की महाभारत

Mamata Trap in BJP's chakravyuh: अगर हम बात 2016 के विधानसभा चुनावों (assembly elections of Bengal) की करें तो इस बार स्थिति बहुत अलग है। इस बार राज्य में टीएमसी के सामने एक बड़ा मजबूत विपक्षी दल बीजेपी है।

Mamata Trap in BJP's Chakravyuh: बीजेपी के 'चक्रव्यूह' में फंसी दीदी, नंदीग्राम से तय होगी बंगाल की महाभारत

Mamata Trap in BJP's Chakravyuh:  पश्चिम बंगाल में आठ चरणों में चुनाव होना है। लेकिन बंगाल की धुरी नंदीग्राम बना हुआ है और नंदीग्राम ही बंगाल की सियासत का राह को तय करेगा। लेकिन इतना है कि राज्य की सीएम ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) और टीएमसी (Trinamool Congress -TMC) प्रमुख ममता बनर्जी नंदीग्राम के लिए बीजेपी के बनाए गए चक्रव्यूह (Chakravyuh) में फंस (TMC chief Mamata Banerjee) गई हैं। क्योंकि जिस तरह से ममता ने नंदीग्राम में डेरा डाला उससे राज्य की सियासत में मैसेज जरूर चला गया है। ये राज्य की जनता जान गई है कि राज्य में खेला तो होगा ही।

नंदीग्राम अब आगामी बंगाल की महाभारत का रास्ता तय करेगा। ये ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) भी जान चुकी हैं कि राज्य में सत्ता की राह इतनी आसान नहीं है, जो 2016 में थी। बीजेपी ने बंगाल में जिस तरह से एंट्री की और टीएमसी के वोट बैंक में सेंध लगाई, वह इतनी आसान नहीं थी। इसमें जनता का सहयोग और समर्थन जरूर है। असल में राज्य में टीएमसी का कोई वोट बैंक नहीं है। ये वोट बैंक कभी वाम दलों का हुआ करता था और उससे पहले कांग्रेस का। लिहाजा वोट बैंक का खिसकना कोई बड़ी बात नहीं है।

अगर देखें बंगाल का राजनीतिक मिजाज बहुत स्थिर रहा है तभी वामपंथी दलों ने 34 साल पूरे किए हैं और अब तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने सत्ता में 10 साल पूरे कर लिए हैं। बंगाल के चुनावी अतीत के मद्देनजर टीएमसी की जीत की हैट्रिक का दावा अनुचित नहीं लगता, लेकिन दूसरी तरफ इस बार सत्ताधारी दल के लिए चुनावी राह आसान भी नहीं लगती। क्योंकि वोट का मिजाज समझाना आसान नहीं है। बंगाल में किसी दौर में ये वोटर कांग्रेस का हुआ करता था फिर ये वाम दलों की तरफ शिफ्ट हुआ और उसके बाद टीएमसी के खेमे में आया।

अगर हम बात 2016 के विधानसभा चुनावों (assembly elections of Bengal) की करें तो इस बार स्थिति बहुत अलग है। इस बार राज्य में टीएमसी के सामने एक बड़ा मजबूत विपक्षी दल बीजेपी है। वहीं इस विपक्षी दल बीजेपी ने लोकसभा चुनाव में जिस तरह के राज्य में टीएमसी को झटका दिया और उससे 18 सीटों को झटक लिया, ये टीएमसी के लिए बड़ी चुनौती है। लिहाजा विधानसभा चुनाव में  टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) चक्रव्यूह (Chakravyuh) से घिर गई हैं। वहीं ममता राज्य में कमजोर हो रही हैं और इसका एक बड़ा उदाहरण ये है कि उन्होंने सभी विपक्षी दलों को चिट्ठी लिखकर एकजुट होने की अपील की है। ममता ने उस कांग्रेस से भी अपील की है, जिसके खिलाफ वह राज्य में चुनाव लड़ रही है।

यानी इसके मायने साफ हैं। आपको याद होगा कि 2011 के चुनाव में भी ऐसा ही कुछ हुआ था जो अब हो रहा है। तब ममता एक मजबूत विपक्ष के तौर पर राज्य में चुनाव लड़ रही थी और वाम दल सत्ता में थे। उन्हें गुमान था कि उनका वोटर कहीं नहीं जाएगा। लेकिन ममता ने वामदलों को सत्ता से बाहर फेंक दिया और सत्ता पर काबिज हो गई। यही नहीं 2011 के चुनाव में तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य अपनी सीट नहीं बचा सके।

वाम दलों का वोट बैंक हो रहा बीजेपी की तरफ शिफ्ट

चुनाव के साथ ही मतदाता के मनोविज्ञान को भी समझने की जरूरत है। हर मतदाता एक लीडरशिप चाहता है। जो आज के समय में वाम दल और कांग्रेस के पास राज्य में नहीं है। लिहाजा वाम दलों का कैडर बीजेपी की तरफ शिफ्ट हो रहा है। बंगाल में कुछ साल पहले तक बीजेपी के पास कैडर नहीं था। लेकिन आज कैडर है। ये कहां से आया। लिहाजा इसे समझा जा सकता है कि बंगाल में जनता कुछ खेल करने के लिए तैयार है।

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बीजेपी दस साल में एक सीट से 18 सीटों पर पहुंच गई

अगर राज्य में बीजेपी की ताकत का आंकलन करें तो राज्य में बीजेपी महज दस साल में लोकसभा की एक सीट से 18 सीटों तक पहुंच गई है। वहीं राज्य में बीजेपी का कैडर बहुत मजबूत हो गया है। बीजेपी ने भले ही 2016 के विधानसभा चुनाव में सिर्फ तीन विधानसभा सीटें जीती हों लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने 18 सीटें जीती। वहीं 2009 के लोकसभा चुनाव में (2009 Lok Sabha elections) बीजेपी ने एक सीट जीती थी। जबकि बीजेपी ने 2014 में दो सीटें जीतीं और 2019 के लोकसभा चुनावों में 40 में से 18 सीटें जीती और ये दर्शा दिया कि वह राज्य में मुख्य विपक्षी पार्टी है।

आखिर बीजेपी किस आधार पर 200 से ज्यादा सीट जीतने का कर रही है दावा

असल में बीजेपी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में 18 सीटें जीती थी। बाकी चार सीटों पर उसका वोट परसेंटेज काफी अच्छा था। जबकि टीएमसी और बीजेपी में महज तीन फीसदी का अंतर था। टीएमसी को 2016 के विधानसभा में 45 फीसदी से ज्यादा वोट मिले थे और वह 211 सीट जीतने में कामयाब रही। बीजेपी की रणनीति साफ है कि अगर वह पांच फीसदी वोट में सेंध लगाने में कामयाब रही तो राज्य की सत्ता में आने का रास्ता साफ हो जाएगा।