Maruthu Pandiyar Brothers:मारुथु पांडियार भाई, दक्षिण भारत में अंग्रेजी शासन के विद्रोह के महानायक

Maruthu Pandiyar Brothers:मारुथु पांडियार भाईयों ने अंग्रेजी राज के खिलाफ छेड़ा था और अंग्रेजी शासन के विद्रोह के बाद दोनों मारुथु पांडियार भाई को फांसी की सजा दी गई थी।

Maruthu Pandiyar Brothers:मारुथु पांडियार भाई, दक्षिण भारत में अंग्रेजी शासन के विद्रोह के महानायक
Maruthu Pandiyar

Maruthu Pandiyar Brothers:भारत के इतिहास में 1857 की क्रांति के बारे में सभी लोग जानते हैं। लेकिन क्या आप दक्षिण भारत की 16 जून 1801 की क्रांति के बारे में जानते हैं। मारुथु पांडियार भाईयों (Maruthu Pandiyar Brothers)  ने अंग्रेजी राज के खिलाफ छेड़ा था और अंग्रेजी शासन के विद्रोह के बाद दोनों मारुथु पांडियार भाईयों (Maruthu Pandiyar Brothers) को फांसी की सजा दी गई थी। असल में इतिहास के पन्नों में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इन महानायकों के बारे में कम जानकारी दी गई है।

असल में भारत में 1857 की क्रांति से 50 साल पहले मारुथु पांडियार भाइयों (Maruthu Pandiyar Brothers) ने अंग्रेजों की दमनकारी शासन के खिलाफ आवाज उठा थी और एक आंदोलन का नेतृत्व किया था। आज की दिन यानी 16 जून, 1801 को आजादी के इन दो नायक भाइयों ने तिरुचि किले से स्वतंत्रता की घोषणा जारी की थी और जिसके बाद अंग्रेजी शासन इन दोनों भाईयों से चिढ़ गया था। मारुथु भाईयों (Maruthu Pandiyar Brothers)  ने राज्य की सभी जातियों और समुदायों के लोगों से अंग्रेजी राज के खिलाफ लड़ाई लड़ने का आह्वान किया था और राज्य की जनता को एकजुट कर अंग्रेजों के खिलाफ बगावत की थी।

इतिहास के मुताबिक जब अंग्रेजी शासन के विरूद्ध बगावत तेज हो गई तो अंग्रेजी सरकार ने दोनों भाईयों के खात्म के लिए एक बड़ी फौज को तिरूचि भेजा और और इसके बाद 24 अक्टूबर, 1801 को दक्षिणी तमिलनाडु के तिरुपुथुर किले में दोनों भाइयों को सार्वजनिक रूप से फांसी पर लटका दिया गया था। बताया जाता है कि मारुथु पांडियार भाई शिवगंगा साम्राज्य के शासक थे और उनके साथ ही अंग्रेजी शासन ने हर साथी विद्रोही, उनके सेनापति और नौकर, उनके बेटे और यहां तक ​​​​कि उनके युवा पोतों को भी फांसी की सजा दी।

इस सामूहिक फांसी के साथ ही ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और उसके सहयोगियों ने भारत के दक्षिणी राज्यों द्वारा एक भयंकर विद्रोह को सफलतापूर्वक समाप्त कर दिया था। असल में ये विद्रोह दर्ज होने के बाद भी लोगों को इसकी जानकारी नहीं है। ये एक ऐसा विद्रोह है जिसे बहुत कम याद किया जाता है, और इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में इसका उल्लेख बहुत कम मिलता है।

ALSO READ:-Ahilyabai Holkars Jayanti: मालवा की महान योद्धा महारानी अहिल्या बाई होल्कर, एक पत्र से जिन्होंने जीत लिया युद्ध

बाघ से लड़े थे मारुथु भाई और मिला पांडियार नाम

इतिहास में मिली जानकारी के मुताबिक पेरिया मारुथु और चिन्ना मारुथु का जन्म मोक्का पलानीसामी थेवर और पोनथा के घर में हुआ था।  थेवर शिवगंगा साम्राज्य के दूसरे राजा मुथुवदगनाथ की सेवा में तैनात थे। हालांकि मारूथु भाईयों (Maruthu Pandiyar Brothers) के जन्म के बारे में कोई सटिक जानकारी नहीं है। लेकिन कहा जाता है कि पेरिया मारुथु यानी बड़े मारुथु, का जन्म 1748 में रामनाद राज्य में हुआ था।

ALSO READ:-Coronation of Shivaji Maharaj: आज के दिन हुआ था हिंदू सम्राट शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक

जबकि चिन्ना मारुथु यानी छोटे उनसे पांच साल छोटे थे। उन्होंने बच्चों के रूप में महल में काम किया था और वह राज परिवार के करीबी माने जाते थे। इसी दौरान उन्होंने युद्ध की कला सीखी और तोपखाने का भी प्रशिक्षण लिया। ऐसी कहानियां प्रचलित हैं कि दोनों भाइयों ने बिना हथियारों के एक बार राजा को एक जंगली बाघ से भी बचाया था। जिसके बाद वह राजा के करीबी हो गए थे और उन्हें पांडियार की उपाधि प्रदान की।