Mission UP-2022: यूपी फतह के लिए अखिलेश रच रहे हैं कई चक्रव्यूह, अगले साल प्रदेश बनेगा कुरूक्षेत्र

Mission 2022 in UP: जिस समीकरण के साथ मोदी-शाह ने 2014, 17 और फिर 19 में जीत का परचम लहराया था। भाजपा और संघ परिवार हर विपक्षी गठबंधन या चक्रव्यूह भेदने के लिए लगन से काम कर रहे हैं।

Mission UP-2022: यूपी फतह के लिए अखिलेश रच रहे हैं कई चक्रव्यूह, अगले साल प्रदेश बनेगा कुरूक्षेत्र

Mission 2022 in UP: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव (Assembly elections) से पहले अब सियासी उत्साह बढ़ता जा रहा है। सबसे ज्यादा उत्साह सत्ताधारी दल में देखने को मिल रहा है। केंद्रीय नेता (central leader) लखनऊ आ रहे हैं। सीएम और प्रदेश के नेता (CM and state leaders) दिल्ली जा रहे हैं। पुराने समीकरणों (old equations) को भी दुरुस्त करने की कोशिशें जारी हैं। जिस समीकरण के साथ मोदी-शाह ने 2014, 17 और फिर 19 में जीत का परचम लहराया था। भाजपा और संघ परिवार हर विपक्षी गठबंधन या चक्रव्यूह भेदने के लिए लगन से काम कर रहे हैं। साथ ही विपक्ष की ओर से इस तरह की कोई हरकत नहीं की गई है।

हालांकि राजनीति (Politics) में यह जरूरी नहीं है कि जो दिख रहा वो ही सच हो। इसका मतलब यह नहीं है कि विपक्ष में हलचल नहीं दिख रही है तो विपक्ष कुछ नहीं रहा है। ग्राम पंचायत चुनाव (gram panchayat election) में कोरोना लहर (corona wave) से उपजा गुस्सा भाजपा के खिलाफ दिख रहा है। ज्यादातर निर्दलीय जीते, लेकिन एक पार्टी के रूप में सपा का प्रदर्शन बेहतर रहा। हालांकि पंचायत चुनाव में भी भाजपा ने पूरा जोर दिया था, लेकिन सपा उतनी सक्रिय नहीं दिखाई दी। इसके बाद भी परिणाम एसपी के पक्ष में चले गए।

यूपी में चल रहे राजनीतिक हालात (political situation) में बीजेपी हर लिहाज से मजबूत दिखती है। चाहे वह नेतृत्व हो या संगठन या कैडर। इसके बाद भी विपक्ष की ओर से सत्ता विरोधी लहर (anti-incumbency wave) को भुनाने के लिए ऐसा कुछ नहीं हो रहा है कि भाजपा को चुनौती मिलती दिख रही है। लेकिन पंचायत चुनाव के नतीजों से पता चला है कि यह सडक़ भाजपा के लिए भी आसान नहीं है। बशर्ते विपक्ष की सक्रियता हो और उसके पत्ते अच्छे से चल सकें।

विपक्ष की सक्रियता अभी जमीन पर नजर नहीं आ रही है, लेकिन समीकरण के लिहाज (in terms of equation) से सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव (SP President Akhilesh Yadav) ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश (Western Uttar Pradesh) में तुरुप का पत्ता (Trump card) खेलने की तैयारी कर ली है। यह रहस्य की बात है कि अखिलेश ने सपा के खिलाफ हमेशा से रहे ऐसे वोट बैंक को अपने पाले में लाने के लिए बड़ा दांव खेलने का मन बना लिया है। यह गुप्त बात है कि सपा अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह के बेटे और अब राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष जयंत चौधरी को उपमुख्यमंत्री के दर्जे में नेता बनाकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रोजेक्ट कर सकते हैं।

ध्यान रहे कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश (Western Uttar Pradesh)सपा का गढ़ (BSP stronghold) रहा है। यहां संख्या के मामले में दलितों, मुस्लिमों और जाटों का बोलबाला रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बाकी हिस्सों में करीब छह रिकॉर्डेड सीटों को जटलैंड कहा जाता है, क्योंकि चौधरी चरण सिंह के समय से ही उनका नेतृत्व हमेशा जाट नेताओं के हाथ में रहा है। जाट धार्मिक धु्रवीकरण के कारण भाजपा में या चौधरी चरण सिंह की विरासत के नाम पर चौधरी अजित सिंह के साथ जाता रहा है।

मोदी-शाह के दौर में हिंदुत्व के नाम पर जाट ने पिछले तीन चुनावों (three elections) से तमाम दावों और अटकलों के बावजूद भाजपा को समर्थन दिया। एसपी का यहां मुस्लिम वोट बैंक (Muslim vote bank) है, लेकिन दलित, जाट और अगड़े इससे अलग रहते हैं। अभी जाट नेतृत्व पूरी तरह हाशिए पर है। चौधरी अजित सिंह की भी मौत हो चुकी है। ऐसी स्थिति में जाटों की सहानुभूति वोट आरएलडी यानी जयंत के साथ जाने की संभावना है।

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यह रहस्य की बात है कि अखिलेश ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश (Western Uttar Pradesh) के अपने सबसे कमजोर क्षेत्र में जयंत को आगे कर यहां खुद को मजबूत करने की कोशिश शुरू कर दी है। समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) अपनी ओर से जयंत को पूरे दमखम के साथ पेश करेगी। इसके साथ ही अखिलेश उन्हें अपना उपमुख्यमंत्री कहकर जाटों के बीच पेश कर सकते हैं, इसके संकेत भी मिल चुके हैं। ऐसी स्थिति में पश्चिमी उत्तर प्रदेश का वह क्षेत्र जो किसानों के आंदोलन से प्रभावित है। ओर वो भाजपा से खासे नाराज भी है। ऐसी स्थिति में अगर जाटों का वोट भी सपा-आरएलडी गठबंधन के खेमे में आ जाता है तो न सिर्फ भाजपा को करारा झटका लगेगा, बल्कि सपा को बड़ी ताकत मिल सकती है।